Wednesday, 14 March 2012

बीहड़ के बागी


आज पान सिंह तोमर देखी, कैसे एक नेशनल अवार्ड विजेता बीहड़ का बाशिंदा बन गया हाथ में बन्दुक उठा ली बहुत ही अच्छी फिल्म बनाई है तिग्मांशु धुलिया ने |  दरअसल ये हमारी व्यवस्था के मुह पर एक चाटा है, उस व्यवस्था  पर जो लोगो को हथियार उठाने को मजबूर करती है, उस व्यवस्था पर जो लोगो को धर्म के नाम पर बांटती है | क्या कोई अपनी मर्ज़ी से दस्यु बनना चाहता है, क्या कोई अपनी मर्ज़ी बीहड़ो का वनवास काटना चाहता है, मेरे ख्याल से नहीं| ये हमारा समाज और हमारी व्यवस्था है जो ये करने पे मजबूर करती है| एक धावक की जिन्दगी इस फिनिश लाइन पर आके रुकेगी खुद उसने भी नहीं सोचा होगा|  फिल्म में पान सिंह तोमर का एक डायलोग याद आता है "जब भागते थे तो किसी ने नहीं पूछा आज बागी बन गए है तो अखबारों और रेडियो पर खबरे आ रही है ", दर्द महसूस किया जा सकता इस एक  वाक्य में, क्या वाकई में नाम होने के लिए बदनाम होना जरूरी है| जब व्यवस्था नाकाम हो जाती है तो अक्सर एक सामानांतर बल उस व्यवस्था के खिलाफ देखा जा सकता है,गोयाकि की यही लोग बागी कहलातें है| आज के डाकू और उस दौर के बागियों में बड़ा भारी अंतर है, आप शायद सोच रहे होंगे के मुझे पान सिंह तोमर सरीखे डाकुओ से सहानुभूति हो गई है इसीलिए उसे डाकू कहने से बच रहा हूँ | दरअसल उस दौर के डाकू बागी इसकिये थे क्योंकि इनकी छवि रोबिन हुड वाली थी, वो अपने लोगो के बीच में रहते थे जबकि उनके सर पर 50,000 इनाम होता था| ऐसे न जाने कितने डाकू हुए है जिनके डाकू बनने के पीछे पान सिंह जैसे ही कोई वजह रही है,कुछ ने आत्मसमर्पण कर दिया जैसे रघुवीर सिंह, मौहर सिंह, माखन सिंह  और कुछ का इस व्यवस्था पर भरोसा कभी नहीं लौट पाया जैसे पान सिंह तोमर, मलखान सिंह, डाकू मान सिंह| आज जो डाकू बीहड़ो मैं रहते हा दरअसल वो बीहड़ो मैं रहतें ही नहीं, वो डाकू नहीं वो एक किस्म के माफिया है जो अपने स्वार्थ के लिए या किसी और के स्वार्थ की आतंक का पर्याय बने हुए है| डाकू मान सिंह का खेडा राठौर में मंदिर बनाया गया,क्योंकि लोगो में उनका विश्वास था, क्या ऐसा आज जगजीवन परिहार जैसे  डाकू के लिए मुमकिन है?